07-08-2026 प्रवचन मुनि श्री 108 दुर्लभ सागर जी महाराज जी [ पिपराई गाँव
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07 Aug 2026
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07,08,2026 प्रवचन मुनि श्री 108 दुर्लभ सागर जी महाराज जी [ पिपराई गाँव
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नमो अरहताम नमो सिडम नमो नमो आयरणमो नमो नमो लोए सबसामोसाम नमो अरिहताम नमो अरताम नमो सिंम नमो आयरणम नमो नमो वयाम नमो लोए सबसामो नमो अरहतामो नमो सिंम नमो आयरणमो नमो वयाम नमो लोए सबसामोसा नमो अरहताम अरि नहीं अरु अरु नमो अरहतामो अरहताम नमो सिंम नमो आयरणमो नमोण नमो वयाम नमो लोए सबसामो बोलिए देवाधिदेव 108 मूल नायक श्री पारनाथ भगवान की जय परम उपकारी आचार्य भग विद्या सागर जी महामुनिराज की जय शिक्षा प्रदाता आचार्य भग समय सागर जी महामुनिराज की जय महाराज की जय जय मंगलाचरण नहीं किया ना अभी नमः श्री वर्धमानय निर्दत कलात्मने सालोक नाम त्रिलोक नाम य दर्पणा बोलिए आचार्य भगवंत सम स्वामी महामुनिराज की जय। जिसे कहते हैं ना कि हम भी दरिया हैं। हमें अपना हुनूर मालूम है। जिसे कहते हैं ना कि हम भी दरिया है। हमें अपना हुनूर मालूम है। जिस तरफ भी चल पड़ेंगे। रास्ता हो जाएगा। जिस तरफ भी चलेंगे निश्चित रास्ता हो जाएगा। निश्चित आप अगर मन बनाएंगे कि चलना है तो रास्ते अपने आप आपको मिलते चले जाएंगे और वो ताकत वो शक्ति आपके अंदर है। बस आप अपने आप को पहचानने का प्रयास करो और अपने आप को आगे बढ़ाने के लिए मन को तैयार करो तो आप भी निश्चित आगे तक बढ़ते चले जाओगे। आप एक निश्चित बात ध्यान रखना अपने आप पर इतना विश्वास रखना कि हमने जो निर्णय ले लिया है वह सही है। जो मैंने निर्णय लिया है वो सही है और उसे ही मुझे सही साबित करके बताना है। हां मुझे पीछे नहीं हटना। मुझे किंतु परंतु नहीं करना। हां। हम जो निर्णय लेंगे एक पल के लिए वो हमें ऐसा लगेगा शायद यह अच्छा नहीं है। हम वो कर लेते तो ज्यादा अच्छा होता। जो नहीं होता है ना वही ज्यादा अच्छा लगता है। जो हम नहीं कर पाते ना हमें वही ज्यादा अच्छा लगता है। तो निर्णय कोई भी लिया आओ जो छूट गया वो चाहिए होता है उसे नहीं। यह मानव की एक विचार शक्ति कहना चाहिए कि जो हम नहीं कर पाते हैं और उस पर अगर हम विचार करते हैं तो हमारा जो निर्णय है और जो हम करने जा रहे हैं उस पर हम पीछे अपने आप हो जाते हैं। अपने आप को पीछे नहीं करना है। तो निश्चित ध्यान रखना कि हम जो कर रहे हैं उस पर बहुत मनोभाव से लगे रहे और अ रहे हैं। पूज्य गुरुदेव जो निर्णय ले लेते थे फिर उसके बाद उस निर्णय को बदलने की ताकत दुनिया की कोई भी ताकत उस निर्णय को बदलने नहीं देती थी उन्होंने एक बार जो मुख से बोल दिया सो बोल दिया उसमें कोई बदलाहट नहीं होती थी इसी प्रकार से निश्चित मान के चलना हमारे पास बहुत सारे ऑप्शंस होते हैं और होता यही है कि जब एक ऑप्शंस पर चलते हैं तो जब चलते हैं चलते चलते ही ऐसा होता है शायद वो कर लेते तो ज्यादा अच्छा अच्छा होता नहीं यह बात अपने मन मस्तिष्क से बाहर हटा दो। अब हम आगे बढ़ गए तो हम जहां बढ़े वही सही है। बाकी दुनिया की पूरी चीजें गलत है। जब तक आप अपने मन को ऐसा तैयार नहीं करोगे तब तक ध्यान रखना आप आगे नहीं बढ़ पाओगे और आगे बढ़ना है। तो इस बात को निश्चित रूप से आपको मन और मस्तिष्क पे अपने आप बिठाने का ध्यान रखना। और एक बात और निश्चित बोल रहा हूं कि कामयाब होने की कामयाब होने की राह हर कोई सिखाता है। कामयाब होने की राह हर कोई सिखाता है। पर नाकामयाबी को कैसे हैंडल करना है। ये सिखाना समाज घर और दुनिया भूल जाती है। समाज दुनिया और घर भूल जाती है कि नाकामयाबी में हमें अपने जीवन को कैसे जीना है। इसकी बात मैं आपसे कल करूंगा। आज तो सिर्फ मैंने क्या बात बोली है उसको ध्यान रखना कि जो निर्णय ले लिया है वो क्या है अब मैंने कॉमर्स ले लिया तो कॉमर्स ही ठीक है अब मैथ्स की तरफ मुझे नहीं जाना ध्यान रखना अब मैंने जिससे विवाह कर लिया है वही लड़की ठीक है अब दुनिया की जितनी लड़कियां है उससे अच्छी नहीं हो सकती ध्यान रखना मैंने जो कोचिंग अटेंड कर ली है मैं बता रहा हूं प्रैक्टिकली जो होता है मैंने जो कोचिंग अटेंड कर ली है वही छह कोचिंग है अब ये अरे वो उसमें कर लेता तो बहुत अच्छा रहता नहीं मैंने जो कोचिंग अटेंड कर लिए वही ठीक है। मेरा निर्णय फाइनल इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। तो जो हमने किया है वो सबसे अच्छा है। उससे अच्छा दुनिया में कोई भी नहीं है। ठीक है ना? तो अब आप लोग बोलना मेरी पत्नी दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी है। मेरा पति दुनिया का सबसे अच्छा क्या है? पति है। आपको यही विचार करना है ना। अपनी चॉइस पर कोई किंतु परंत तो नहीं करना कि मैंने क्यों कर लिया? क्या कर लिया? और क्यों और क्या में हम निश्चित रूप से अपने जीवन को नीचे ओर गिराते चले जाते हैं। और जब कल का क्रीम कोटेशन ब्रह्मचरणी हेमलता दीदी ने बताया क्यों डरे जिंदगी में क्या होगा? कुछ ना होगा तो जिंदगी में तजुर्बा होगा। इसलिए शुरुआत करी थी। इन्होंने यही दिया। निश्चित ध्यान रखना हमें डरना नहीं। और ना डर कर हमें क्या करना है? अगर हार भी गए तो हार से भी कुछ ना कुछ सीखने को मिलेगा। और असफलता से भी कुछ ना कुछ हमारे जीवन में अनुभव बढ़ेगा। यह बात हो गई और अब हम इन बच्चों के लिए दो पांच मिनट बोल लेते हैं। ठीक? अब बात कर रहा हूं मैं आपसे आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज जी की। बड़ी सुंदर व्याख्या है। अपनी पुस्तकें खोल ले और पेज नंबर एक पर आ जाए आप और पेज नंबर एक पर आए और व्याख्या में आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज जी की व्याख्या अलबेली अनोखी है। उन्होंने बहुत अच्छी व्याख्या करी है और उनकी व्याख्या को आपके सामने रखता हूं। उन्होंने शुरुआत करी है कि श्री नाम लक्ष्मी का है। श्री नाम काहे का है? लक्ष्मी काय जो प्राणी मात्र को सुख प्रदान करने वाली है। हां उसे लक्ष्मी कहते हैं। अब पता है आप लक्ष्मी किसको बोलते हो? क्या बात है? ऐसा इशारा हो गया। ऐसा इशारा हो गया कि हम लक्ष्मी किसको बोलते हैं? इसको बोलते हैं। ये क्या होता है? पैसा। पैसे को बोलते हैं। लेकिन क्या पैसा सुख दे देगा? पर यहां आचार्य महाराज कह रहे हैं कि नमः श्री वर्धानाय श्री का मतलब लक्ष्मी होता है और वो लक्ष्मी प्राणी मात्र को सुख प्रदान करने वाली ती है और वो लक्ष्मी क्या है तो आप लोगों की नजर में वो रुपया पैसा हीरा पन्ना मोती जवारात ये लक्ष्मी है परंतु वास्तव में यह जो हीरे जवाहरात एक कंकर पत्थर है ऐसा आचार्य ज्ञान सागर जी कह रहे हैं ये एक झांझड़े का पत्थर होता है झांझड़ा मतलब यह मारवाड़ी भाषा है है ना? मारवाड़ी बैठे हैं। हमारे गुवाहाटी वाले बैठे हैं। मारवाड़ी में झांझड़े का पत्थर है। झांझड़े का पत्थर ज्ञान सागर जी मारवाड़ी थे। ठीक? तो उन्होंने झांझड़े का पत्थर मतलब झांझड़ा मतलब कोई काम का नहीं उसका पत्थर बोलते हैं। तो झांझड़े का पत्थर है और एक हीरा है। अब बोले झांझड़े के और हीरे में क्या है? बस हीरा चमकता है। और वो झांझड़े का पत्थर वो चमकता नहीं है। तो अब जैसे उसकी चमक पर हम क्या हो जाते हैं? प्रसन्न हो जाते हैं, रीझ जाते हैं और फिर उससे उसकी चमक से प्रेम करने लगते हैं और फिर उसको देखकर ऐसा लगता है कि बस यह बहुत कीमती है और जैसे ही हमें पता चलता है कि ये कीमती है वही पत्थर जो सड़क पर पड़ा है फिर उसको हम कहां रख देते हैं? अपनी तिजोरी में बंद करके रखते हैं। फिर तिजोरी में बंद करके रखा। यहां तक तो ठीक था लेकिन पता चल जाता है कि बहुत ज्यादा कीमत वाला है तो भय खड़ा हो जाता है और भय खड़ा हो जाता है तो रात दिन उसकी पहरेदारी करो उसके आगे पीछे सो है ना मतलब क्या हुआ जो चीज किसकी थी आराम की थी उसने हमारे आराम को जोखिम में डाल दिया और निश्चित रूप से वो जो है वो क्या हुआ वो हमारे दुख का कारण बन गया अब मैं आपसे यही कहना चाह रहा हूं कि यही कहना चाह रहे हैं कि जैसे ही ज्ञान हुआ कि यह हीरा कीमती है। वैसे ही क्या हो गया? वो हीरा दुख का कारण बन गया। क्या कारण बन गया? दुख का कारण बन गया। और मान लीजिए एक उदाहरण और यहां दे रहे हैं। ज्ञान सागर जी कोई एक भील था। अब वो उस हीरे की कीमत को नहीं समझ रहा है। और उसने क्या किया? उसे अपने बड़े चाव से उसने अपने गले में पहन रखा। लेकिन उसको कीमत ही नहीं मालूम कि क्या कीमत है। वो हार में क्या पहन रखा है। उसने उसको समझा ही नहीं है। अब उसकी वो कदर ही नहीं कर रहा है। तो कदर नहीं कर रहा है। उसको पता नहीं। मतलब क्या उसको ज्ञान नहीं है इसलिए उसका वो अनुभव नहीं कर पा रहा है और कहते हैं ना कि अगर हमें पता चल जाए चांदी की कीमत तो चांदी को हम कहां रखेंगे तिजोरी में और लोहा कहां पड़ा है देखो वो क्विंटल से सामने पड़ा है लोहा उसकी कोई कीमत नहीं है ना क्योंकि पता है लोहा कोई काम का नहीं है और चांदी क्या आएगी काम की है उसको हम तिजोरी में रखेंगे किसको किसको रखेंगे चांदी को और इसी प्रकार लोहा भी काम का है पता चल चल जाए किसके लिए? एक बहादुर के पास। महाराज जी कह रहे हैं कि वो मन और तलवार है। अब क्या करेगा? वो चिपका के। उसको पता है कि लोहा जरूर है लेकिन इस तलवार से मैं अपनी रक्षा करूंगा। और कहा इन्होंने यहां पर कि एक घड़ी है जो उस छोटे से लोहे के टुकड़े के कल पुर्ज से बनी है। वो भले छोटी सी है पर क्या हुआ? वो 200 300 500 की होगी। क्यों? पता है कि लोहा का टुकड़ा जरूर है। लेकिन इससे क्या हो रहा है? ज्ञान की प्राप्ति हो रही है तो आप बड़े महंगे पैसे में भी दे देते हो तो यहां यही कहना चाह रहे हैं एक और उदाहरण यहां पर उन्होंने बहुत अच्छा दिया उसको भी आपके बीच में रखकर फिर अपनी बात को बोलता हूं कि यहां ज्ञान सागर जी बोल रहे एक लकड़हारा है और वो जंगल में गया और जंगल में लकड़ी काट रहा था तो जंगल में उसको एक रत्न दिख गया उसने सोचा बहुत अच्छा सा दिख रहा है चलो ले चलते हैं पत्थर है गोल गोल सा चमकीला है। बड़ा सुहावना है। इसको तो अपन ले चलते हैं। क्या अपने पप्पू के काम आएगा? पप्पू मतलब कौन? उनका बच्चा है ना? बोले उसके काम आएगा। खेलने के लिए काम आएगा। खिलौना नहीं है। खुश हो जाएगा कि पापा क्या लाए? खिलौना लाए। और बस उन्होंने वो दे दिया। चमकीला वो क्या था? चिंतामणि रत्न था। क्या था? चिंतामण। अब जैसे ही घर में वो रत्न आया बच्चे खेल रहे थे। लेकिन उसका एक बहुत बड़ा फायदा क्या हो गया? बोले वो चमकीला चिंतामणि रत्न चिंतामणि रत्न ऐसा होता है जो रात में भी चमकता है रात में भी उसका उजाला जहां रख दो चिंतामणि रत्न क्या होता है चारों तरफ उसका उजाला फैलता चला जाता है किसका चिंतामणि रत्न का अंधेरे में भी हैलोजन की आवश्यकता नहीं है ऐसा चिंतामणि रत्न होता है और लगभग ये चिंतामणि रत्न जो होता है वह कहां होता है पता है आपको कहां होता है पता है हां हां और कोई बताएगा अब आप आपको हम बताएं जो समुद्र में पाया जाता है ना वो चिंतामणि रत्न नहीं होता वो कौन सा रत्न होता है कोहिनूर होता है वो कौन सा होता है कौन सा होता है कोहिनूर होता है अब आपको एकदम परफेक्ट तो नहीं कहता हूं लेकिन ऐसा सुनने में आया है कि जो सर्प होते हैं जो सर्प होते हैं उन सर्पों के फण के ऊपर वह रहता है। ठीक? इसलिए बता रहा हूं। अब बात याद आ गई तो दो मिनट पहले वो क्लियर कर दूं कि हम लोग मांगीतुंगी में गए थे। मांगीतुंगी एक ऐसा शाश्वत क्षेत्र है जिस क्षेत्र पर कहना चाहिए कौन मोक्ष गए? पता है आपको नहीं गए? पता है कौन गए? कौन गए? बलदेव। वहां से मोक्ष गए। ठीक तो वहां पर आपको देखने को मिलेगा बलदेव की पीठ वाले दर्शन वो ऐसा क्षेत्र है जहां पर कृष्ण जी का क्या हुआ था मरण हुआ था ऐसा वो क्षेत्र है और उस क्षेत्र पर हमें जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ मांगीतुंगी में तो मैं आपको बता रहा हूं मांगी तंगी में वहां पर कृष्ण दिवाली कब आती हैगी कार्तिक पूर्णिमा अमावस्या हां सॉरी कार्तिक अमावस्या आती है ना तो नहीं दिवाली नहीं कार्तिक पूर्णिमा की बात है वो 15 दिन बाद पूर्णिमा मुझे अच्छे से याद है कार्तिक पूर्णिमा पर एक अतिशय घटता है सुनना है नहीं सुना बोलो थोड़ा सा उस पर याद आ गया है तो वो सुना देता हूं आधी बात आज आधी बात और कभी बताऊंगा वो पूरा प्रवचन हो जाएगा उसमें अगर सुना एक बार तो अभी अरुण में सुनाया था मैंने यह वाला वहां मांगी तंगी में एक पहाड़ी है और वो जो पहाड़ी है वह सीधी खड़ी है। एक मांगी है और एक तुंगी है। तो जो पहाड़ी है वो इतनी खतरनाक पहाड़ी है कि उस पर कोई चढ़ नहीं सकता है। आप कितना ही प्रयास करना जो लोग क्या बोलते हैं वो जो वो बोलते हैं ना जो चढ़ने वाले होते हैं उनको क्या बोलते हैं? ट्रेकर। ट्रेकर क्या बोलते हैं वो? ट्रेकर बोलते हैं ना। ट्रेकर लोग भी प्रयास किया लेकिन वो ट्रेकर लोग भी उस पहाड़ी पर नहीं चढ़ पाए और यहां तक कि एक ने चढ़ने का प्रयास किया तो हाथ पैर टूट गए पर वो खड़ी पहाड़ी है उस पर चढ़ पाना बहुत टेढ़ी कीड़ और बहुत मुश्किल है। पर जब मैं वहां गया तो वहां जाने के बाद वहां के लोगों ने बोला बोले एक व्यक्ति है जो चतुर्मास स्थापना से निष्ठापन तक कार्तिक अमावस्या तक साधना करता है और साधना करने के साधना क्या करता है जंगल में रहता है जंगल में रह के क्या करता है बोले अन्न का त्याग और बोले वो व्यक्ति जैन नहीं है लेकिन वो व्यक्ति क्या करता है पत्तों का और वहीं के उसका रस और जल लेकर चार महीने रहता है। क्योंकि एक बात ध्यान रखना चार महीने रहेगा व्यक्ति चला जाएगा। लेकिन बोले वही जड़ी बूटियों के पत्तों का रस और वही जो जंगल में पानी मिलता है उस पानी से चार महीने रहकर मौन पूर्वक साधना और मंत्रों का उच्चारण करता है और फिर उसके पास एक ऐसी शक्ति आती है। उस शक्ति के माध्यम से ये जो खड़ी चढ़ाई दिख रही है इतने सैकड़ों फीट ऊपर चढ़ाई उस चढ़ाई पर वो व्यक्ति चढ़ता है। वो चढ़ता ऐसा है कि वहां से उसको सिद्धि मिलती है। जैसे एक बंदर चढ़ एक छिपकली चढ़ती है ना ऐसे कर कर वो हाथ से करके चढ़ जाता है तो मैंने कहा मुझे विश्वास नहीं है मुझे विश्वास नहीं है तो बोले महाराज जी अगर आपको विश्वास नहीं है तो जो 25 साल से 30 साल से चल रहा है हम उस व्यक्ति को बुला देते हैं तो पास के ही गांव में पास के ही गांव में वो व्यक्ति रहते थे कमेटी मांगी कमेटी ने गाड़ी भिजवाई और व्यक्ति सामने आकर खड़ा हो गया और जब सामने आकर खड़ा हुआ तो उससे हमारी चर्चा हुई। चर्चा के दौरान जब हमने उनसे बात करी तो हमने कहा आप एक बात बताइए आप कैसे चढ़ते हैं? तो उन्होंने बताया बोले महाराज जी मैं चार महीने मौन रहता हूं। जंगल में रहता हूं। ऐसा ऐसा करता हूं और इस प्रकार से मुझे आज्ञा मिलती है यहां के देवताओं की और फिर मैं ऊपर चढ़ता हूं। तो हमने कहा अच्छा आप एक बताओ कि ऊपर चढ़ने के बाद आपको क्या दिखता है? अब वहां क्या मिलता है? बोले एक ही काम होता है। वहां एक झंडा है उस झंडे को मैं पहले गाड़ता हूं। फिर फिर जैसे ही झंडा गढ़ता है अब सुनना आगे की बात बोले जैसे ही झंडा गढ़ता है एक बहुत बड़ा सांप आता है और बोले वो सांप ऐसा होता है कि अंधेरे में मैं चढ़ता हूं रात की बात है और ये काम करता हूं रात को 11:00 से 12:00 बजे के बीच में काम होता है जब मैं झंडा चढ़ाता हूं वहां पूरा अंधेरा रहता है। जैसे ही वो सर्प आता है तो उसके उस फणा पर एक बहुत बड़ी मणि है। उस मणि की चमक से वो पूरी पहाड़ी चमकती है। वो पूरा मतलब मेरे ख्याल से वो एरिया होगा बहुत बड़ा एरिया होगा। वो एरिया पूरा चमकने लगता है और जब वो एरिया चमकने लगता है तो बस उसी के सहारे वो सर्प आता है फकारता है और मैं जब ध्वजारोहण करता हूं वहां ध्वजा चढ़ाता हूं तो फिर उसके बाद वो मुझे पीछे बोलता है आ जाओ मेरे पीछे फिर वो आगे आगे चलता है और मैं उसके पीछे पीछे जाता हूं और जब मैं उसके पीछे पीछे जाता हूं तो नीचे की ओर वो एक रास्ता है जो पहाड़ी के अंदर अंदर की ओर ले जाता है वो गुफा है और गुफा में जाता हूं तो आप बहुत ध्यान से सुनना आश्चर्य तो हो रहा है लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है यह मुझे नहीं पता पंचम काल का यह अतिशय क्या है मुझे नहीं मालूम लेकिन वो व्यक्ति बोल रहा है तो शायद सच ही होगा झूठ क्यों बोलेगा वो फिर बोले वो वहां ले जाता है वहां ले जाने के बाद क्या होता है बोले एक मुनिराज मिलते हैं कौन मिलते हैं मुनिराज मिलते हैं और वो जो मुनिराज हैं वो जो मुनिराज है वो मुनिराज वहां पर बैठे हुए हैं और वो बोलते हैं हां चढ़ा लो अर्घ इशारा करते हैं तो वहां पर मैं अर्घ चढ़ाता हूं और देखता हूं तो अंदर बहुत सारी प्रतिमाएं वो जो प्रतिमाएं हैं उन प्रतिमाओं में चमक है। ऐसा लगता है जैसे सोने की हो। ऐसा लगता है जैसे हीरे मोती की वो प्रतिमा है और वो दर्शन होते हैं और वो जो महाराज है वहां बाहर ही बैठे हैं। मंदिर के बाहर बैठे हैं अंदर नहीं जा सकता। क्योंकि सर्प जो है अंदर जाने नहीं देता और वहीं पर द्रव्य सामग्री चढ़ी हुई है। रखी हुई है। द्रव्य सामग्री मतलब अष्ट द्रव्य काहे की है? बोले वो पाषाण के बने हुए बर्तन की के अंदर वो सामग्री सजी है और फिर मैं उस सामग्रियों को चढ़ाता हूं। मैंने कहा आपको कुछ आता है क्या? बोले आता कुछ नहीं है। मुझे अर्घ आदि नहीं आता है। बस वो आदेश आता है तो मैं ऐसे घुमाता हूं और स्वाहा बोल देता हूं। और वो सब सामग्रियां जो है उन सामग्रियों को चढ़ाता हूं। दर्शन करता हूं और फिर उसके बाद मुझे ज्यादा देर खड़े रहने को मौका नहीं मिलता। क्यों? महाराज जी जो रहते हैं वो कहते हैं जाओ। और फिर उसके बाद में उस सामग्री को चढ़ाकर वापस अपनी जहां ध्वजारोण होता है उस स्थान पर आकर वहां पर बैठ जाता हूं। अब मैंने पूछा महाराज जी कैसे हैं? बोले दुबले पतले और बोले जैसे आप वैसे ही दुबले पतले हैं। इस प्रकार से वो महाराज हैं और वो हर बार मिलते हैं। 30 साल से जा रहा हूं। 30 साल है। ऐसा लगभग मानना 30 साल से जा रहा हूं। वैसी ही काया, वैसा ही कद वैसा ही रूप, वैसा ही रंग, कोई परिवर्तन नहीं। मैंने कहा कैसी काया है? बोले जैसे आप दुबले हो ऐसे ही दुबले जैसे आपका कलर है ऐसे ही आपके जैसा ही कलर है। आप जैसी इतनी हाइट आपकी मान लीजिए इतनी हाइट क्यों महाराज है? और हमेशा वो देखो वो मिल गया मांगी तंगी। की वो देखो सामने मांगे तंगी की वो पहाड़ी वो दिख रही ये वाली नहीं वो वाली पहाड़ी जो डंडे के समान खड़ीगी देख रहे हो आप स्क्रीन पर देखो। वो पहाड़ी की बात कर रहा हूं जो खड़ी पहाड़ी चढ़ पाना मुश्किल है और वो इतनी कठिन पहाड़ी है उस मांगी की उस पहाड़ी पर वो व्यक्तित्व चढ़ता आएगा ठीक और वो जो ऊपर स्थान दिख रहा है वो जो ऊपर स्थान है वहां पर पूरा वो बहुत बड़ा एरिया है आपको दूर से दिख रहा है लेकिन वो एरिया बहुत बड़ा है लगभग वो एरिया होना चाहिए मतलब मेरे ख्याल से हजारों फीट का एरिया होना चाहिए हजार बाय हजार का सर्कल होगा वो जो खंभा वाली पहाड़ी थी उस पहाड़ी पर अब वो को बोलते हैं कि वहां मैं आता हूं। वहां आने के बाद वो मुनिराज मुझे हर बार दिखते हैं। हर बार मैं अर्घ चढ़ाता हूं। और फिर उसके बाद जब मैं नीचे आता हूं तो कैसे आता हूं? मैंने कहा इतनी ऊंची पहाड़ी से हजारों फीट ऊंची वो पहाड़ी उस पहाड़ी से नीचे कैसे उतरते हैं? तो बोले एक रील काहे की जो धागा सिलती है ना उस रील हां हमारे यस संयोग की बात है। दीपक भाई हमारे साथ थे। दीपक भैया उस समय जिनवाणी वाले हमारे साथ ही थे। क्यों साथ थे? मैंने उनको एक काम सौंपा था। उन्होंने वो काम किया था। वह बताते तो क्या काम सौंपा था? मुझे विश्वास नहीं हो रहा था इसलिए वो काम सौंपा था। तो रील वो डालते हैं ऊपर से और रील डालने के बाद वो जो रील है उस रील के सहारे चढ़ के वो नीचे उतरते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कहा ऐसा कैसे होता है? मैं इन सब चीजों को स्वीकार नहीं करता हूं। और फिर मैंने दीपक भैया से बोला संतान साई से बोला मुझे यह सब कुछ कहानी झूठी लग रही है। कोई व्यक्ति ऐसा चढ़ता है तो फिर दीपक भैया से बोला मुझे वो चाहिए डोम कैमरा तो दीपक भैया ने बोला हम तो महाराज जी अपन तो उधर के हैं। कहां से लाए मैंने कहा मुझे नहीं मालूम तुम्हें डोम कैमरा लाना होगा और मैं उस ऊपर कैमरे डोम कैमरा घूमेगा और मैं देखना चाहता हूं झंडा है या नहीं है। वो वहां से अपन यहां नीचे बैठ के स्क्रीन पर लगाकर वो पूरा देखेंगे। तो दीपक भैया ने वहां मदद करी थी और डोम कैमरा हमने भिजवाया। अब डोम कैमरा ऊपर तक गया। जाने के बाद वो जो झंडा है वो दिख गया। वो जो झंडा है वो स्थान हमें डोम कैमरे में दिख गया। और साथ में वो जो पहाड़ी जहां जाते हैं वहां दिख गया। अब जैसे ही कैमरा उधर जाता है वो कैमरा वही है। मतलब उस तरफ बहुत तेज हवा है। उस तेज हवा में उनका वो जो डोम कैमरा था वो गिर गया। अब गिर गया तो दूसरे कैमरे बोले महाराज जी अब दूसरा कैमरा हम नहीं भेज सकते। उधर उधर जो है वो बहुत तेज हवा आती है। उधर हम चाहते थे वो जो महाराज जी जिस गुफा में उसका दृश्य हमें देखने को मिल जाए। यह बात तो सत्य सिद्ध हो गई कि वो ध्वजा लगाता है और ध्वजा हमने खुद ने देख ली। इतनी बात तो लाइफ देख ली हमने। सब कुछ देख लिया हमने उससे डोम कैमरे से। लेकिन वो डोम कैमरा जो पीछे की ओर जो पहाड़ी में जाकर अंदर जाते हैं और जो गुफा में भगवान जो हैं जो बता रहा है बड़े-बड़े आपके जैसे यहां भगवान है ऐसे भगवान है उनके दर्शन होते हैं और वो दर्शन सिर्फ अंधेरे में चमकीले उस कोहिनी वो जो चिंतामणि रत्न है उससे होते हैं। बोले उसी से होते हैं बाकी तो अंधेरा रहता आएगा। तो अब वो दर्शन हम नहीं कर पाए और फिर जब इतनी बात सही लगी तो मैंने कहा निश्चित रूप से सही होगी। अब उस कैमरे को देखकर पुनः मैंने बुलवाया उनको। मेरे मन में विचार आया और फिर मैंने तीन बार बुलवाया। तीन बार वह कहीं गांव में रहते थे वहां आए तो दूसरी बार मैंने उनको बुलवाया और मैंने कहा क्या आप यह बताइए आपकी बात सत्य सी लग रही है। हमने ऊपर भी वो भिजवाकर देख लिया। वो झंडा तो हमें दिख गया। और फिर सबसे बड़ी बात तो यह कि इन लोगों ने हमें आपकी वीडियो भी दिखा दी कि आप रील से कैसे उतर रहे हैं। वो वीडियो आपको YouTube पर मिली दिख जाएगी कि कैसे उतरते हैं तो और आपको चढ़ते हुए भी देख लिया। अब मैं आपसे ये पूछना चाहता हूं क्या मैं इस पहाड़ी पर ऊपर जा सकता हूं? तो बोले महाराज जी ऐसा है पहले तो आप हमें आशीर्वाद दो। मैंने कहा किस बात का? पिछली बार हम इतने साल से लगातार वहां पर ध्वजा चल रहा है। पिछली बार हम ध्वजा नहीं चढ़ा पाए। मैंने कहा क्या हो गया? बोले पिछली बार ऐसा हुआ था कि हमारे गांव के दूसरे व्यक्ति ने कहा क्योंकि मैं चढ़ता हूं तो पूरी दुनिया मुझे पूजती है। पूरी दुनिया मुझे पूजती है और मेरे स्पर्श करती कि आप एक बहुत बड़ा काम करते हो तो उन्हें लगा और उन्होंने कहा इस बार मुझे आदेश मिला है तो मुझे आदेश मिला है तो वो चढ़े थे और वो चढ़े थे तो थोड़ी ऊपर गए और नीचे गिर गए और नीचे गिरे ऑन स्पॉट वही उनका मरण हो गया। अब वो मरण हो गया है तो मरण के पश्चात पिछली बार नहीं जा पाए। इस बार मैंने प्रयास किया तो वही व्यक्ति की आत्मा कह लो या जो कह लो उन्होंने मुझे ऊपर नहीं चढ़ने दिया। अब आप कुछ ऐसा आशीर्वाद दो कि इस बार मैं जा पाऊं दो साल से पहली बार जो सैकड़ों सालों से ध्वजा चढ़ रही थी पूर्णिमा पर कार्तिक पूर्णिमा दो साल से नहीं चढ़ी। पिछली बार उन्होंने नहीं जान दिया और डेथ हो गई थी तो लोग डर गए थे और इस बार मैं चाहकर भी नहीं चढ़ पाया। मैंने कहा क्या करूं? मैंने चातुर्मास पर साधना भी करी नहीं कर पाया। आपको ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं जा पाऊं। तो मैंने कहा ठीक है जा पाओ आपको मैंने आशीर्वाद दिया फिर उन्होंने मैंने उनसे कहा मेरी भावना है हमें ऊपर जाना है कुछ ऐसा रास्ता बताओ तो फिर वो गए और जाने के बाद फिर उन्होंने ये देखो वही पहाड़ी आ गई देखो यही वो पहाड़ी गई जिसकी मैं बात कर रहा हूं फिर उन्होंने कहा बोले ठीक है महाराज जी मैं अब तीन दिन बाद आऊंगा मुझे साधना करनी होगी आज्ञा लेनी होगी उन्होंने आज्ञा ली आज्ञा लेने के बाद वहां पहुंचे तो वहां पर जब आज्ञा लेने के बाद तीन दिन बाद फिर गाड़ी भेजी वो आए। उन्होंने कहा महाराज आज्ञा मिल गई है कि आप चल सकते हो कोई बाधा नहीं। मैंने कहा हमें क्या करना होगा? बोले नहीं आपके लिए आज्ञा मिल गई है पर आप मेरे साथ चलना। आपको कुछ नहीं करना है। आप पीछे पीछे मेरे साथ उसके साथ चलना। फिर वापस चला गया। मैंने कहा ठीक कोई बात नहीं चतुर्मास होता है तो देखते हैं। फिर वापस चले गए तो मेरा भाव हुआ कि जब मैं जा सकता हूं तो सब लोगों को ले जाना है। मैं अकेला क्यों जाऊं। फिर मैंने पुनः उनको वापस बुलाया। मैंने खबर करी और मैंने कहा मैंने कहा हमारी भावना यह है कि हम सबको ले जाना चाहते हैं। क्या सब जा सकते हैं? क्या सीढ़ियां बन सकती है? तो उन्होंने कहा महाराज जी ये तो बहुत टेढ़ी खीरेगी। इसके लिए फिर मुझे दो-तीन दिन जंगल में जाना होगा। हमने कहा ठीक है भैया चले जाओ। फिर वो गए और जाने के बाद उन्होंने अब जब अगली बार आए तो उन्होंने मुझसे बोला बोले महाराज जी आदेश मिल गया है। लेकिन आदेश ये मिला है सीढ़ियां ऊपर तक आप बना सकते हो। अब मानना सीढ़ियां ऊपर तक बनाना। करोड़ों का खर्चा। करोड़ों का खर्चा कोई छोटी मोटी बात नहीं थी। इतनी ऊपर तक सीढ़ी बनाना। उसी समय प्रशांत जी मुंबई आए हुए थे और प्रशांत जी मुंबई से मैंने उस रास्ते की पूरी राशि ली थी। रास्ता पूरा खराब था। प्रशांत जी से कहा कि रास्ता बनवाना। उन्होंने कहा जी महाराज जी बनवा देते हैं। अब फिर वहां मैसेज किया कि वो सीढ़ियां बनाना और ऐसी ऐसी बात है। बोले दो करोड़, पांच करोड़, 10 करोड़, 20 करोड़, 25 जितना लगे आप तो आदेश करना महाराज सीढ़ियां बन जाएगी। अब सीढ़ियां बनने की बात हो गई जब उनको बुलाया तो उन्होंने मुझसे कहा बोले महाराज जी ऐसी आज्ञा मिली हैगी अब सुनना उन्होंने ही नहीं मैंने पूर्व प्रयास किया वहां मांगी तंगी की पहाड़ी पर मैं जाकर भी ध्यान करने बैठा और मैंने भी अपने हिसाब से आज्ञा ली कि वास्तविकता में हम सीढ़ी बना सकते हैं कि नहीं और सीढ़ी बनाने का तय हुआ तब जब सीढ़ी बनाने का तय हुआ तो तय होने के बाद क्या हुआ वो आए तो उन्होंने एक बात बोल दी बोले महाराज जी आज्ञा मिल गई है लेकिन एक ही बात है जो अखंड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता होगा वही ऊपर चढ़ सकता है। तो मैंने कहा मान लीजिए कि शादी बोले शादी हो गई है लेकिन पतिव्रता हो और पत्नी वृत्ता हो वही चढ़ेगा और मान लो किसी ने प्रयास भी किया वो गिर जाएगा। मैंने कहा भैया यह तो बहुत हेडक वाला मामला है। ऐसे में बोले महाराज जी मैं नहीं जानता वहां से ऐसे ही आदेश आया है। तो मैंने कहा ठीक है अगर तुम्हारी ऐसी भावना है तो लेकिन अपन सीढ़ियां तो बनाएंगे। इससे कम से कम ब्रह्मचर्य व्रत की महिमा बढ़ेगी। इससे कम से कम ब्रह्मचर्य व्रत की महिमा बढ़ेगी। लोग समझेंगे क्या कहलाता है ब्रह्मचर्य व्रत मैंने कहा हम तैयार है बिल्कुल तैयार है यहां पर दो पहरेदार बिठा देंगे लिखवा लेंगे पहले ही कि भैया आप ऊपर चढ़ रहे हो शुद्ध ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हो चाहे शादीशुदा हो आपने पहले पाप किया हो पहले प्रायश्चित लो जाकर फिर ऊपर चढ़ पाओगे आप नहीं तो नहीं चढ़ पाओगे आप ये बात मैंने कह ली अच्छी बात है भैया हो रहा है तो बहुत अच्छी बात है क्योंकि मैंने भी जो अनुभूति करी थी कि हो गई अब इस पहाड़ी पर दान दातार पैसा देने को तैयार कमेटी बनाने को तैयार लेकिन जब मैंने पूरा प्रयास किया तो वहां के जो आईएएस ऑफिसर अध्यक्ष थे उन्होंने कहा कि इस पर हम अभी काम नहीं कर सकते क्योंकि माता जी ज्ञानमती जी ने पीछे एक पहाड़ पर एक प्रतिमा बनाई है। उसका केस चल रहा है। यह पहाड़ सरकार के वन विभाग में आता है। जब तक वो केस सॉल्व नहीं होगा। फिर उसके बाद परमिशन मिलेगी। फिर उसके बाद आगे अपन काम कर पाएंगे। अपने को दर्शन की परमिशन है। लेकिन नया कंस्ट्रक्शन और ऊपर पहुंचने की परमिशन के लिए आगे बढ़ना पड़ेगा। वो बात वही की वही ठंडी पड़ गई। नहीं तो मैं तो पूरे मनोभाव के साथ बैठा था कि दान दातार दे रहा है और मैं चाहता था कि सबके दर्शन करूं और सबके दर्शन कराऊं और सबके दर्शन होना चाहिए। ये मेरे पूरे मनोभाव थे और ये वो जो माता जी ने बनाए भगवान 108 फीट है ना शायद 108 फीट के ना ये भगवान है। इसका ही थोड़ा सा मामला चल रहा है जो पहाड़ी काट के बनाए। अब बड़ी अभी तक उसकी परमिशन नहीं मिली। आप विशुद्धि बढ़ाओ कि परमिशन मिले और वहां तक सीढ़ी पहुंचे और हम भी उन मुनिराज के दर्शन करें। ऐसे कौन से मुनिराज हैं जो खा नहीं रहे पी नहीं रहे। कैसे वहां विराजमान है? कौन है? क्या है? ये एक बहुत बड़ा मेरील एक बहुत बड़ा अतिशय और ऐसी कौन सी प्रतिमाएं जो इस प्रकार की प्रतिमाएं वहां पर विराजमान है जो चमक रही है और ऐसा कौन सा सर्प है जिसकी उस पर ऐसी मणि लगी हुई है और जिस मणि की चमक के माध्यम से वो अंधेरे में भी क्या हो जाता है उजाला हो जाता है ये मन में अभी तक बात बैठी हुई है लेकिन कर हम कुछ नहीं पाए लेकिन इतना जरूर है कि वहां का प्रभाव मैंने पता है वहां की प्रवचन श्रंखला प्रारंभ करी थी लगभग 30 प्रवचन किए थे मैंने और 30 प्रवचन सब अतिशय कि वहां क्या क्या अतिशय घटा जो मैंने लोगों से सुना और जो लोगों और भी बहुत लोगों के माध्यम के अलावा भी मैंने पता किया जो ग्रंथों में लिखा उन अतिशयों को मैंने मांगी तंगी की बताया तो मांगी तंगी वाले बोले बोले महाराज आपके प्रवचनों के बाद मांगी तंगी में क्योंकि वहां पर एक बात होती है जिनको बच्चे नहीं होते हैं पूर्णिमा पर वहां जाते हैं पांच पूर्णिमा करते हैं पांच पूर्णिमा में उनको संतान हो जाती है तो निश्चित वो क्षेत्र सामान्य क्षेत्र नहीं है। अतिशयकारी और पावरफुल क्षेत्र है। वो मैंने खुद ने वहां अनुभव किया है कि मैंने अपने आप को कितना वहां पर अपने आप को अपनी ऊर्जा को कई गुना अपने ओरे को कई गुना पाया है। कहां मांगी तंगी से तो था तो सही भाव और आगे रुकू लेकिन मांगी तंगी में ही आचार्य भगवान का आदेश आ गया। इसी समय विहार करना है और आपको पारोला का पंच कल्याणक कराना है। तो वहां से मन नहीं होते हुए भी मुझे गुरु आज्ञा के कारण क्योंकि उस समय तक आचार्य श्री जी दे रहे नहीं दे रहे पर आगे आचार्य श्री की आज्ञा आई थी तो फिर हमने कहा अभी टालना भी नहीं है आज्ञा है ना और अभी गुरु जी जो बोल रहे वो करना और अपनी भावना भी नहीं रखना मुझे यही रहना है अगर मैं जरा सी बात बोल देता कि नहीं यही रहना है अच्छा बोले मानता नहीं है अभी आज्ञा दे नहीं रहे थे अब दे रहे तो मान नहीं रहा है तुरंत खाली खड़ा लेकिन अभी भी मन की बात अधूरी है आज नहीं तो कल कभी ना कभी तो उस मांगी तंगी पहाड़ी पर जरूर जाऊंगा और वो जो भावना है उसको करूंगा। लेकिन अभी एक और कहानी है वो अभी नहीं बताई। समय हो गया है। अगर आपका पुण्य होगा तो जो दूसरी कहानी है जो वास्तविकता में एक और सात दरवाजे वाली गुफा है जो बहुत पीछे जो जिसमें की इतनी बड़ी प्रतिमा है जिसके अंगूठे पर 108 श्रीफल रखे जा सकते हैं। उसको समय हो गया है। उसको अब आगे आपके बीच में उस कहानी को रखूंगा। पांच 35 एक मिनट एक्स्ट्रा ही हो गया है हमारा और अभी तो मुझे बात करनी थी काहे की ज्ञान सागर जी की लेकिन ज्ञान सागर जी की बात अभी हाल इतनी कर पाऊं उसको और एंड कर देता हूं कि वो चिंतामणि रत्न कैसा था उसको सुन लीजिए और कि उसके माध्यम से क्या होता था उजाला हो जाता था अब ये उजाला हो जाता है उस गरीब को नहीं मालूम था उस उजाले से क्या उसका घर का क्या हो रहा था रात का ईंधन का खर्चा तेल का खर्चा जो है घासलेट का खर्चा या घी का खर्चा बचा वो खुश लेकिन उसको जानकारी नहीं है कि क्या है उसको पता नहीं है लेकिन एक जोहरी ने बोला अरे पगले कहां तू लकड़ी काटने जा रहा है ये क्या है चिंतामणि रत्न है तू जो मांगेगा वो इससे मिल जाएगा और हुआ यही कि चिंतामणि रत्न जो था उस चेतना उसने मांगा कमरा दो उसने मांगा खाने का दो उसने मांगा कपड़े दो सब मिल गए और वो खुश हो गया कि भैया ये क्या ठाट हो गए मेरे तो तो इसका तात्पर्य क्या हुआ वो वो हीरा लक्ष्मी नहीं है। लक्ष्मी क्या है? ज्ञान लक्ष्मी है। और ज्ञान लक्ष्मी कैसे इसको आगे की बात कल बताऊंगा मैं। ठीक और याद रहा तो आगे का भी आप याद दिला दोगे तो वो वाला संस्मरण भी सुना दूंगा। चलिए महाराज जी के पास एक मिनट एक्स्ट्रा हो गया हमारा। महाराज जी के पास पहुंचा दे कैमरा और आप लोग बैठे रहे उठना नहीं है। आप लोगों को भी प्रश्नों का जवाब देना है।